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प्रतिलिपि
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बुद्ध धर्म और ईसाई धर्म के बीच का अंतर, 15 का भाग 12: प्रश्न और उत्तर

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इस एपिसोड में, सुप्रीम मास्टर चिंग हाई यह प्रकट करती हैं कि सच्चाई और मुक्ति की सच्ची चाह हमें आत्मज्ञान की ओर मार्गदर्शन करने, हमारे आंतरिक दृष्टिकोण को बदलने, और जीवन की हमारी समझ को गहरा करने के लिए आवश्यक हैं।

(“तत्काल ज्ञानोदय क्या है?”) और इसके मापदंड क्या हैं? ज्ञान प्राप्ति का सीधा मार्ग क्या है, और इसके मापदंड क्या हैं?

तत्काल ज्ञानोदय का अर्थ है कि आपको ज्ञानोदय तुरंत प्राप्त हो जाता है। इसका बस यही सब कुछ है। बिल्कुल तुरंत नकद पैसे की तरह। आप बैंक जाते हैं, आपको नकदी तुरंत मिल जाती है। यदि आप दीक्षा के लिए मेरे पास आते हैं, तो आपको तुरंत आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है, ठीक है? और अब, मानदंड यह है कि आपको निष्ठावान होना चाहिए और वास्तव में मुक्ति और ज्ञानोदय की तीव्र उत्कंठा होनी चाहिए। बस ईमानदार और खुले दिल के रहें, यह जानते हुए कि हमें मदद की जरूरत है। मुझे इसे साबित करने का मौका दीजिए।

साथ ही, इसके बाद, हमें अपने भीतर और अधिक स्वर्गों को खोजने और सर्वोच्च स्वर्ग, या निर्वाण, या बुद्ध की भूमि पर वापस जाने के लिए प्रतिदिन ईमानदारी से अभ्यास करना होगा। और साथ ही, दीक्षा के बाद, हमें करुणा, दान, प्रेम-भाव का संकल्प लेना चाहिए: किसी भी प्रकार के पशु(-लोग) को न खाना, किसी को भी किसी भी प्रकार से नुकसान न पहुंचाना। यही एक अच्छे और स्थायी ज्ञानोदय का आधार है। और यदि आप इनका पालन करते रहेंगे, तो आप प्रतिदिन अधिक प्रबुद्ध होते जाएंगे जब तक कि आप पूर्णतः प्रबुद्ध न हो जाएं, बुद्ध न बन जाएं या ईसा-समान न हो जाएं। तब आप स्वयं की सहायता कर सकते हैं, और यदि दूसरों की आपसे आत्मियता है तो उन्हें भी मुक्ति प्राप्त करने में सहायता कर सकते हैं। एक मास्टर बनो।

(यह मेरा अपना अनुभव भी है।) मैं सोच रहा था कि मई 29 को कैलिफोर्निया में अपने दीक्षा समारोह के लिए पंजीकरण कब कराऊं। और दीक्षा के दौरान, मैंने तुरंत (आंतरिक स्वर्गीय) प्रकाश देखा और (आंतरिक स्वर्गीय) ध्वनियाँ सुनीं। यह बिलकुल सच है।

ठीक है। यह अगला प्रश्न है। “कोई व्यक्ति ज्ञानोदय के सिद्धांत को रोजमर्रा की जिंदगी के व्यवहार में कैसे लागू कर सकता है?” हम कौन सी गतिविधि करते हैं? हम कौन सी किताबें पढ़ते हैं? हम कौन सी प्रार्थनाएँ करते हैं, इत्यादि?

देखिए, हमारे पास प्रार्थना करने के लिए कोई निर्धारित सूची नहीं है, लेकिन आप प्रार्थना कर सकते हैं कि आप प्रतिदिन अधिक आत्मज्ञान प्राप्त करें और ईश्वर के ज्यादा निकट आएं। और यही सर्वोच्च प्रार्थना है। बुद्धत्व के निकट, ईश्वर के निकट या बुद्धत्व, यह एक ही बात है। और आप प्रतिदिन ध्यान करते हैं। आप प्रार्थना करे जिसके लिए भी आप प्रार्थना करना चाहें। ईश्वर और बुद्धों द्वारा नेक प्रार्थनाएँ हमेशा स्वीकार की जाती हैं। और वे गतिविधियाँ, आप करें जैसे कि हर दिन करते हैं। यदि आप डॉक्टर हैं, तो आप अपने मरीजों की देखभाल करते हैं। यदि आप इंजीनियर हैं, तो आप अपनी मशीनों का ख्याल रखते हैं। यदि आप टैक्सी चालक हैं, तो आप अपने ग्राहकों का ख्याल रखते हैं और उन्हें सही जगह पर पहुंचाते हैं। आत्मज्ञान प्राप्ति के बाद, बस थोड़ा सा ही अंतर रह जाता है। आप इसे समर्पण और प्रेम से करते हैं, न कि पहले की तरह अज्ञानता पूर्वक और सिर्फ पैसा कमाने के लिए।

गतिविधियां सामान्य हैं; बस मनोदृष्टि बदल जाती है और मानसिक समझदारी बदल जाएगी। हम इसे अत्यंत विनम्रता, प्रेम, भक्ति और इस ज्ञान के साथ करते हैं कि हमारे प्रत्येक कार्य के पीछे एक सर्वोच्च शक्ति है। यह बहुत ही आश्वस्त करने वाला और उत्साहवर्धक है। सिर्फ उबाऊ ही नहीं, बल्कि बिना किसी उत्साह, बिना किसी प्रेरणा के हर दिन उबाऊ काम करना।

(मैंने सुना है कि कुछ धार्मिक संप्रदायो एक संप्रदाय से दूसरे संप्रदाय में परिवर्तन को मना करते हैं।) क्या आपको लगता है कि ऐसा करना ठीक है? जब किसी व्यक्ति को कोई दूसरा मास्टर अधिक अपील करने वाला और उपयुक्त लगे, तो क्या आप अपने शिष्यों को ऐसा करने से मना करते हैं? नहीं, मैं नहीं करुंगी। मैं कभी किसी को कुछ भी करने से मना नहीं करूंगी। यदि आपको लगता है कि अन्य मास्टरों बेहतर, अधिक प्रबुद्ध, अधिक शक्तिशाली हैं, फिर आपकी इच्छा। तेज़ी से जाओ। और अगर आप कुछ पाओ, तो कृपया वापस आकर मेरे साथ साँझा करें। हालांकि मुझे इस पर संदेह है। मुझे इस पर संदेह है। मुझे संदेह है कि कोई और इससे अधिक अपील करने वाला होगा। यदि आपकी मुझसे आत्मियता है, तो आपको लगेगा कि मैं ठीक हूँ, मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, मैं अत्यंत सर्वोच्च हूँ। बात बस यह है कि हमारा एक दूसरे से लगाव है; हम एक-दूसरे के साथ अच्छा महसूस करते हैं, तो हम दूसरों की तलाश नहीं करते। जो लोग एक संप्रदाय से दूसरे संप्रदाय में परिवर्तित होते हैं, उसका कारण यह है कि उन्हें ज्ञानोदय का अनुभव नहीं होता है। वे अब भी अपने विश्वास को लेकर दुविधा में हैं। उन्हें अपने संप्रदाय पर, अपने तथाकथित नेता, आध्यात्मिक नेता की शक्ति पर संदेह है, इसलिए उन्हें बदलाव करना होगा। यदि आपको किसी मास्टर से कुछ अनुभव प्राप्त हो जाते हैं और आप जान जाते हैं कि उस मास्टर के पास पर्याप्त शक्ति है और वह आपकी रक्षा करता है, और आपके अज्ञानी चरणों में आपका मार्गदर्शन करता है, तो आपको कहीं और देखने की आवश्यकता नहीं है। दूसरा मास्टर, यदि प्रबुद्ध है, ठीक यही करेगा।

(“क्या आपको लगता है कि दुनिया अंत के निकट है?” मुझे लगता है आपने पहले ही इसका जवाब दे दिया है।) नहीं मैं ऐसा नहीं सोचती हूँ। (ठीक है। “यीशु मसीह ने कहा, 'अंतिम दिनों में, बहुत से मास्टरों प्रकट होंगे।' आप इसके बारे में क्या कहते हैं?') बहुत सारे झूठे मास्टरों, है ना? या कई मास्टरों? (कई मास्टरों।) खैर… मैंने आपको पहले ही बता दिया था। यदि आवश्यक हुआ, तो कई मास्टरों प्रकट होंगे; जरूरी नहीं कि यह अंतिम दिनों हो, या दूसरा दिन हो या पहला दिन हो। बहरहाल, हमें हमेशा नकारात्मक तरीके से नहीं सोचना चाहिए। हमें ईश्वर या बुद्ध की कृपा और शक्ति में विश्वास रखना चाहिए। यदि हम न्याय परायण चीजें करते हैं और मदद के लिए भगवान या बुद्ध से प्रार्थना करते हैं, या किसी जीवित मास्टर द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करते हैं, तो हमें डरने की कोई बात नहीं है। हमें डरने की कोई बात नहीं है।

("क्या ध्यान के माध्यम से पूर्णतः शारीरिक श्रवण शक्ति प्राप्त की जा सकती है?") शारीरिक श्रवण क्षमता? हां, कुछ करते हैं, कुछ करते हैं। लेकिन शारीरिक श्रवण उतना महत्वपूर्ण नहीं है; आंतरिक श्रवण अधिक महत्वपूर्ण है। हम केवल इस दुनिया की आवाजें ही सुन सकते हैं; उनमें से अधिकतर सुखद नहीं होतीं, सब गपशप और हिंसक बहसें होती हैं। यदि हम दिव्य भाषा, संदेश सुन सकें तो यह बेहतर होगा। मैं आपको यह गारंटी नहीं दे सकती कि ध्यान के माध्यम से आपकी शारीरिक श्रवण शक्ति बहाल हो जाएगी, लेकिन मैं आपको यह गारंटी दे सकती हूं कि आप स्वर्ग से नरक तक, सभी बुद्ध भूमियों से, या सर्वोच्च-उन्नत से लेकर सर्वोच्च-निम्न तक सब कुछ सुन सकेंगे। इसकी गारंटी मैं आपको दे सकती हूं।

(“जहां तक ​​मुझे समझ में आता है और बाइबल से पता चलता है, यीशु मसीह ने शाकाहारवाद का प्रचार क्यों नहीं किया?”) कृपया मेरा लेखपढ़ें, "लोगों को वीगन क्यों बनना पड़ता है (वीगन आहार के लाभ)।" मैंने बाइबल के बारे में काफी कुछ बता दिया है। यीशु ने लोगों को शाकाहारवाद का उपदेश दिया था। वह स्वयं शाकाहारी थे। अधिकांश लोग (प्रभु) यीशु को नहीं समझते हैं।

(“नकारात्मक, रचनात्मक शक्ति कहाँ से आई?”) भगवान से? वह ऐसा क्यों होने देता है? क्या इसका कोई उद्देश्य भी है?

इसमें नकारात्मक और सकारात्मक दोनों का होना एक प्रकार का रंगमंच है। इसमें मजा आता है। नहीं तो, मजा ही नहीं आएगा, है ना? जैसे इस दुनिया में दिन का उजाला होता है और रात का समय होता है। रात का समय हमारे आराम के लिए होता है, और दिन का समय हमारे सक्रिय रहने और काम करने के लिए होता है। मेरा मतलब है कि हमें आराम के लिए कुछ समय चाहिए। अगर आप दो-तीन दिन तक सो नहीं पाते हैं, तो आपको बहुत कठोर लगेगा। इसलिए रात का समय सब कुछ नींद में छोड देने, आराम करने और तरोताजा होने का होता है। सर्दी का मौसम भी वैसा ही रहता है। आप देखते हैं कि सारे पत्ते गिर रहे हैं और सब कुछ सूखा और भयानक दिख रहा है। लेकिन फिर वे वसंत ऋतु में अपनी शक्ति पुनः प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें आराम की जरूरत है। इसलिए, हर चीज विपरीत रूप में, जोड़ों में बनाई जाती है, ताकि वे एक दूसरे के पूरक हों। अब हमें नकारात्मक शक्ति से डरने की जरूरत नहीं है। हमें बस यह जानना होगा कि यह कैसे काम करता है ताकि हम इसे नियंत्रित कर सकें और इसके चंगुल में न फंस जाएं। इसीलिए हम आत्मज्ञान प्राप्त करते है। ऐसा नहीं है कि हम आत्मज्ञान प्राप्त कर लें और फिर हम विपरीत शक्ति का त्याग कर दें, या हम नकारात्मक शक्ति या माया आदि से घृणा करने लगें। यह मामला नहीं है।

आत्मज्ञान प्राप्ति का अर्थ है सकारात्मक और नकारात्मक दोनों के माध्यम से जानना, और फिर वे एक दूसरे के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकते हैं, और फिर हम नकारात्मक और सकारात्मक दोनों से भी आगे बढ़ते हैं। अ-नकारात्मक और अ-सकारात्मक के बीच से गुजरें, उस सर्वोच्च उन्नत के पास जाएं जहां सब कुछ सद्भाव में मिश्रित है और यहां की तरह नकारात्मक और सकारात्मक के बीच कोई भेदभाव नहीं है। सब कुछ ईश्वर से आता है; सब कुछ ठीक है। असल में, यह सिर्फ एक नाटक है; यह एक दूसरे के लिए पूरक हैं। बस जैसे रंगमंच पर अच्छे राजाओं, सद्गुणी लोगों की भूमिकाएँ होती हैं, और वैसे ही हत्यारों, बुरे और पतित लोगों की भूमिकाएँ भी होती हैं। सब तरह की चीजें। अन्यथा, हमारे लिए नाटकघर में हमारे लिए कोइ मनोरंजक नहीं होता।

आप निर्देशक से पूछ सकते हैं, "आप ने उस बुरे आदमी को क्यों बनाया?" उसका चेहरा बहुत बदसूरत दिखता है और उसके कर्म बहुत दुष्ट हैं। दुष्ट, दुष्ट व्यक्ति, आप उन्हें क्यों बनाया? किस लिए? आप लिख सकते हैं, अपनी कलम से, सभी अच्छे लोगों। इन आपकी ही कलम है और आपने सभी पात्रों का निर्माण किया है। लेकिन उन्हें पैसे कमाने के लिए इसकी जरूरत है, है ना? और हमें मनोरंजन देने के लिए उन्हें इन सभी बुरे लोगों की भी जरूरत है। इसलिए, दर्शकों को यह अवश्य जानना चाहिए कि यह सब नाटकीय है, यह सब प्रदर्शन है, और उन्हें इसमें शामिल नहीं होना है। इसी प्रकार, हमें भी दर्शकों की तरह बनना होगा। हमें इतना बुद्धिमान और प्रबुद्ध होना होगा कि हम ब्रह्मांड के सभी खेलों को देख सकें और पीड़ा‌ से बाहर निकल जाएं। इसीलिए कुछ लोग, जब फिल्में देखने या नाटकघर जाते हैं, तो वे उस प्रदर्शन में इतने मग्न हो जाते हैं कि वे रोते हैं, चीखते हैं, भावनाओं से उनका गला भर आता है। वह पता है आपको? हाँ। वैसे अभी हम है। जब हम अज्ञानी होते हैं, तो हमारा दम घुटता है, या हम उत्साहित हो जाते हैं, हम क्रोधित हो जाते हैं, इस खेल में भावनात्मक रूप से ग्रस्त हो जाते हैं।

यदि हम प्रबुद्ध हैं, तो हम शांत और आत्मलीन होते हैं। और हम देखते हैं; हम आनंद लेते हैं, लेकिन हमे कष्ट नहीं होता। हमें हर तरह के कष्टों में "आनंद" आता है। हम हर चीज को एक फिल्म, एक नाटकघर की तरह देखते हैं। हम इसमें अब और ग्रस्त नहीं महसुस करते हैं या निजी तौर पर हमे कोई आघात पहुंचता है। इसलिए, नरकों या स्वर्गों, ये सब भ्रांतियाँ हैं।

(मास्टर, मुझे खेद है कि मैं माइक्रोफोन के पास नहीं जा सकता।) क्या मैं उस प्रश्न पर आगे बता सकता हूँ? इस तरह की मस्ती का माहौल क्यों है? क्या इसका कोई उद्देश्य है, जैसे सीखना? और अगर यहाँ इतना मज़ा है, तो अदन का बाग या स्वर्ग की तलाश करने का क्या प्रोत्साहन है? वैसे भी हमें यहां मजा आ रहा है।) ठीक है! तो आप यहीं रुको।

पहला सवाल यह है, "यह उनकी रचना क्यों है?" क्योंकि हमें यह पसंद है; हमें यह पसंद है। जैसे हम नाटकघर जाते हैं - उनके लिए हम पैसे भी देते हैं। जीवन में, वैसे दुख भी काफी है, आनंद भी काफी है, लेकिन हम नाटकघर में जाकर वही सब देखने के लिए बहुत सारा पैसा खर्च करते हैं, है ना? लोगों को झगड़ते देखना, और इस तरह की सभी चीजें जो जीवन में कभी-कभी होती ही रहती हैं।

तो लोगों को यह पसंद है, लोगों को यह पसंद है। वैसा ही, हमें यह पसंद है। कभी-कभी हम ये सब खुद पैदा कर देते हैं। क्या आपको लगता है कि हम स्वर्ग में हर समय रहते हैं और कुछ नहीं करते? यह बहुत उबाऊ होगा, अतः कभी-कभी हम मौज-मस्ती करना, क्रीड़ा करना पसंद करते हैं। और फिर हम बहुत ज्यादा मौज-मस्ती करने के चक्कर में मुसीबत में पड़ जाते हैं और फिर रोने लगते हैं। जब आप रोने लगोगे क्योंकि मौज-मस्ती बहुत हो गइ है, तब मास्टर आएंगे और आपको घर ले जाएंगे। और कहते हैं, "अरे, यह तो सिर्फ नाटकघर है। वापस आ जाओ।" लेकिन अगर आपको इससे पर्याप्त आनंद नहीं मिला है, तो आप निश्चित रूप से रुकते हैं। कोई आपको बाहर जाने के लिए नहीं कह सकता; कोई कभी नहीं करेगा। इसलिए, लोग अभी भी इस दुनिया में रह रहे हैं। बहुत कम लोग ही घर जाना चाहते हैं; वे इससे इतने तंग आ चुके हैं, वे थक चुके हैं। मैं केवल उन लोगों के लिए हूँ जो थके हुए हैं। अगर आपको अब भी इस दुनिया में बहुत मजा आता है, फिर तो, आपकी इच्छा है, रहिए। जब समय आएगा, आप पुकारोगे, आप रोओगे।

Photo Caption: "जिंदगी को खुशनुमा और रोशन रहने दें"

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