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इस एपिसोड में, सुप्रीम मास्टर चिंग हाई चर्चा करती हैं कि नरक, स्वर्ग और भौतिक दुनिया के साथ यह दुनिया जैसी है वैसी क्यों है।कल दीक्षा समारोह में, मैं आपको कम से कम यह दिखाऊंगी कि स्वर्ग कहाँ है और वहाँ कैसे पहुँचा जा सकता है। और जो लोग मेरे पास नहीं आते, उनकी मैं मदद नहीं कर सकती। ध्यान रहे, हम लोगों को जबरदस्ती स्वर्ग में नहीं भेज सकते। हमें वह अवश्य जानना होगा। अन्यथा, (प्रभु) यीशु ने उन सभी को परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के लिए बाध्य कर देते। बुद्ध उन सभी को बुद्ध की भूमि में जाने के लिए मजबूर कर देते। नहीं। हम केवल तर्क कर सकते हैं और कुछ को तर्क से सहमत कर सकते हैं। और अगर लोग विश्वास करेंगे फिर वे आएंगे।“जो भी आएगा उन्हें स्वर्ग मिलेगा।” “जो कोई मेरा अनुसरण करेगा, वह अंधेरे में नहीं चलेगा।” (प्रभु) यीशु ने यही कहा था। उन्होंने यह नहीं कहा, "जब मैं यहाँ हूँ तो पूरी दुनिया प्रकाश में चलेगी।" नहीं! “जो कोई मेरा अनुसरण करेगा, वह अंधेरे में नहीं चलेगा।” मैं बलपूर्वक या मात्र मानसिक शक्ति से पूरी मानव जाति को प्रकाश के मार्ग पर नहीं चला सकती, नहीं। यह पहला सवाल है। हम यह सब चुपचाप करते हैं, और केवल वही लोग जिनकी हमसे आत्मियता होगी वो हमारे पास आएंगे और मदद लेंगे। दुर्भाग्यवश, यह ऐसा है। क्योंकि आपको ईश्वर की योजना भी जाननी चाहिए। यह दुनिया चलती रहनी चाहिए। हमारे पास नरक है; हमारे पास (भौतिक) दुनिया है; और हमारे पास स्वर्ग है। ये तीनों लोक आपस में जुड़े हुए हैं और एक दूसरे के लिए महत्वपूर्ण हैं, लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। बहुत से लोगों को नरक पसंद है, बहुत से लोगों को स्वर्ग पसंद है, बहुत से लोगों को यह दुनिया पसंद है। आप इस दुनिया को युहीं स्वर्ग नहीं बना सकते। और बाकी लोग कहाँ जाएंगें? लोग स्वर्ग जाना पसंद करते हैं। है ना? अच्छी बात है, और हम आपको स्वर्ग ले जाते हैं। लोग इस दुनिया में रहना पसंद करते हैं- हमें उन्हें इस दुनिया में रहने का अवसर और स्वतंत्रता भी प्रदान करने होगे। इसलिए, यह दुनिया जैसी है वैसी ही रहनी चाहिए। केवल कुछ ही लोग जो स्वर्ग जाना चाहते हैं, फिर प्रभु आकर उन्हें ले जाएंगे। क्योंकि अलग-अलग वर्गों के लोगों की इच्छाएं अलग-अलग होती हैं। कुछ लोगों को हवाई जहाज पसंद होते हैं, तो हवाई जहाज बनाने वाली कंपनी उनके लिए जिम्मेदार होती है। और जो लोग पैदल चलना या कार से जाना पसंद करते हैं, उन्हें तो दूसरा रास्ता अपनाना पड़ेगा।हम लोगों को केवल इसलिए हवाई जहाज में जाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते क्योंकि यह सबसे अच्छा, सबसे तेज, और सबसे आरामदायक है। सबसे आरामदायक चीजें भी हर किसी नहीं चाहते। इसलिए, आपको दिखते हैं लोगों को धूम्रपान करना या कड़वी कॉफी पीना पसंद है, और वे इसे बहुत अच्छा मानते हैं, उन्हें चक्कर और ऐंठन महसूस होती है, फिर भी वे शराब को बेहतरीन मानते हैं। लोगों को अलग-अलग चीजें पसंद होती हैं। इसलिए नरक, स्वर्ग और दुनिया में विकल्प हैं, अलग स्वभाव वाले लोगों के लिए स्थान हैं। अगर लोग किसी अलग दुनिया में रहना नहीं चाहते हैं तो हम उन्हें मजबूर नहीं कर सकते। अब दूसरा सवाल यह है कि वैश्विक शांति कब और कैसे प्राप्त होगी। पहले सवाल में इसका आधा जवाब पहले ही दिए जा चुका है। आप जानना चाहते हैं कि लोग कब मरते हैं या क्या? जब दुनिया नष्ट कि जाती है या क्या?कब दुनिया नष्ट की जाती है? क्या आप यही जानना चाहते हैं? (जी हाँ।) (…घंटे के संदर्भ में। हत्या के कर्मों का बहुत अधिक संचय हो गया है।) हाँ। (इस प्रकार…यह दर्शाता है कि हम अंतिम दिन के प्रति प्रवण हैं।) ओह मैं समझी। (हाँ, कि हम मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेंगे या नहीं, या अंततः वहाँ पहुँच जाएँगे।) वाह। (कब?) कब? अच्छा, आपको पता है क्या? जब हमारी मृत्यु होती है, तो वही हमारी दुनिया का अंत होता है, चाहे वह किसी भी कारण से हो। मान लीजिए कि मैं कल मर जाऊं, तो यह दुनिया का अंत होगा, क्योंकि तब मुझे दुनिया दिखाई नहीं देगी। तो यही दुनिया का अंत है। इसलिए, हमें सम्पूर्ण अंत के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कमोबेश किसी न किसी तरह, जल्दी या देर से हमारा अंत हो जाएगा। अब सवाल यह है कि हमारी दुनिया या पूरी दुनिया के अंत के बाद क्या करना है?तो मेरे पास इसका जवाब है, और वो ये है कि हम एक दूसरे आयाम में जाएं जो बेहतर है। इसलिए, हम आज से तैयारी शुरू करते हैं। हम तैयारी करते हैं। चाहे यह आपके लिए समाप्त हो या पूरी दुनिया इसे एकसाथ समाप्त कर दे, कोई फर्क नहीं! फर्क कोई नहीं पड़ता! हम किसी दूसरी जगह जाएंगे। (मैं कहूंगा कि इसमें एक सूक्ष्म, व्यक्तिगत दृष्टिकोण शामिल है, क्योंकि...) पूरी दुनिया को कैसे बचाया जाए, है ना? (जी हाँ।) खैर, उन्हें खुद को बचाना होगा। उदाहरण के लिए, मैं हमेशा लोगों से कहती रहती हूं: "मेरे पास स्वर्ग जाने का रास्ता है।" लेकिन अगर लोग स्वर्ग नहीं जाना चाहते, तो मुझे क्या करना चाहिए? हर कोई आपकी तरह आकर मेरी बात नहीं सुनता। समझे? (मैं समझ गया।) क्या अब भी आप चाहते हैं कि मैं उन्हें जबरदस्ती करूं स्वर्ग में जाने या आकर मेरी बात सुनने?(खैर, मास्टरजी, आपने कहा था कि हम दुनिया पर सवाल उठा सकते हैं।) लेकिन ज्ञानोदय में, व्यक्तिगत भिन्नताओं और... के बीच कोई बड़ा अंतर नहीं होता।) ठीक है। (या तो दुनिया से या भीतर …) आपको आत्मज्ञान प्राप्ति के बाद यह बात पता चल जाएगा। (क्या कोई व्यक्तिगत …?) आपको यह पता चल जाएगा। (क्या दुनिया का कोई भाग्य है?) कोई भाग्य नहीं होता। दुनिया का अस्तित्व नहीं है। यह सब हमारा अपना भ्रम है। आपको महान ज्ञानोदय के बाद यह पता चल जाएगा। अपनी सारी व्याकुलताएं, दुनिया के बारे चिंताएँ, बिखर जाएगी। ठीक है? (बहुत सुंदर। धन्यवाद।)आप दुनिया को अलग नजरिए से देखेंगे। बेशक, आप फिर भी एक अच्छे नागरिक होंगे और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करेंगे। आप देखिए, हम अभी जो कर रहे हैं वह भी दुनिया को मदद कर रहा है। क्योंकि जब हम सही तरीके से ध्यान करते हैं और, प्रेम और प्रकाश का प्रसार करते हैं, तो यह बहुत से लोगों को लाभ करेगा। क्योंकि इस संसार में हमेशा ऐसे लोग मौजूद रहते हैं जो (आंतरिक दिव्य) प्रकाश का अभ्यास करते हैं; इसलिए, दुनिया जैसी है वैसी बनी रहेती है। यदि कोई भी व्यक्ति (आंतरिक दिव्य) प्रकाश और सद्गुणों का कुछ भी अभ्यास नहीं करता है, तो दुनिया बहुत पहले ही नरक बन गई होती। तो, इस दुनिया को नरक से अलग करने वाली बात यह है कि इसमें कई प्रबुद्ध, महान संतों हैं, जो प्रकाश, प्रेम और आशीर्वाद फैलाते हैं। और इस दुनिया को स्वर्ग से अलग करने वाली बात यह है कि यहाँ ऐसे लोग केवल कुछ ही हैं, और नहीं कि पूरी दुनिया। जब पूरी दुनिया अभ्यास करती है, फिर वह बुद्ध की भूमि बन जाएगी। लेकिन चूंकि पूरी दुनिया अभ्यास नहीं कर रही है, इसलिए यह (भौतिक) दुनिया है। और यह नरक नहीं है क्योंकि अभी भी लोग हैं हो अच्छे हैं और जो बुरे हैं। यही अंतर है, और दुनिया वैसी ही बनी रहती है।यदि आप दुनिया की मदद करना चाहते हैं, तो हम सद्गुणों का पालन करे; हम (आंतरिक दिव्य) प्रकाश का अभ्यास करे। यह कुछ हद तक मदद करेगा। दुनिया का अंत होगा या नहीं, में नहीं कहूंगा। यह लोगों के हृदय और इच्छाशक्ति तथा ईश्वर की इच्छा पर निर्भर करता है। हमें नहीं पता कि क्या अच्छा है और क्या अच्छा नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि कोई घर इतना सड़ा हुआ, खतरनाक या रहने के लिए असुरक्षित है, तो क्या आप पुरातनता के प्रति प्रेम के कारण उन्हें उसी स्थिति में संरक्षित रखेंगे? नहीं, आपको इसे नीचे लाना होगा और नया बनाना होगा। या फिर आपको इसके बारे में कुछ करना होगा, कुछ बनाना होगा और पूरी चीज का नवीनीकरण करना होगा। इसी प्रकार, ईश्वर की योजना में, हमें ईश्वर की इच्छा को जानना चाहिए। भगवान जो भी करना चाहें, वही सही है।बहरहाल, महान ज्ञानोदय के बाद, आप देखते हैं कि न कोई दुनिया है, न कोई लोग हैं, केवल प्रकाश है, केवल परम आनंद और खुशी है। बाकी सब कुछ उस प्रकाश की मात्र छाया है। उदाहरण के लिए, मैं यहाँ हूँ, मेरी परछाई दीवार पर है। अगर आप परछाई को नष्ट कर देते हैं, तो उसका कोई मतलब नहीं। आप मेरी पीठ के पीछे कुछ रख सकते हैं, ताकि आपको परछाई न दिखे। और इसका मतलब यह नहीं है कि परछाई मर चुकी है, क्योंकि वह तो असल में है ही नहीं। यह तो सिर्फ एक परछाई है; मैं यहीं हूँ। आत्माएं कभी नहीं मरतीं! जो भी आपदा या मृत्यु होती है, वह केवल भ्रम है। मरने की चिंता मत करो। मैं हर दिन "मरती" हूं, और फिर भी मैं जी रही हूं, और अच्छी तरह से।मुझे माफ़ करें। मैं आपके प्रश्न को चुट्कुले के रूप में नहीं ले रही हूँ, लेकिन मुझे नहीं पता कि आपको जवाब देने का अधिक गंभीर तरीका क्या है। मुझे बहुत खेद है। धन्यवाद। (हम बाद में और बात कर सकते हैं।) अरे हां! आप मुझसे बाद में और अधिक पूछ सकते हैं। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।कृपया, महोदया। (मेरे पास शाकाहारवाद (वीगनवाद) के बारे में एक प्रश्न है।) और मैं समझती हूँ, या यह तर्कसंगत लगता है कि हम मांस या जीवित जानवरों को क्यों नहीं खाते हैं। लेकिन फलों और सब्जियों को नष्ट करना क्यों ठीक है? आप तुलना करें। आपको पता है, फलों में चेतना बहुत कम होती है। और पौधे, 90% पानी होते हैं। चेतना- बहुत कम है। बेशक, हमें बिना किसी उद्देश्य के घास नहीं उखाड़नी चाहिए या पौधों को नहीं मारना चाहिए, मेरा मतलब है, केवल क्रूरता से या बिना किसी कारण के। लेकिन हमें ईश्वर को जानने के लिए जीवित रहना होगा। केवल इसी उद्देश्य के लिए हमें कुछ वीगन भोजन करना होगा। अगर आप इसके बिना काम चला सकते हैं, तो आपका स्वागत है। (धन्यवाद।) पौधों को मारना ठीक नहीं है। बस हमें इसकी जरूरत है। क्योंकि (पशु-लोग) मांस आवश्यक नहीं है।(पशु-लोग) मांस के बिना, हम वीगन भोजन पर जीवित रह सकते हैं। लेकिन वीगन भोजन के बिना, हम जीवित नहीं रह सकते। इसलिए, यह न्यूनतम से न्यूनतम हानि है। और सबसे आवश्यक। हम इसे सिर्फ स्वाद, या आनंद के लिए नहीं करते। यह केवल आवश्यकता है जो क्षम्य है। “रोटी के लिए चोरी करता है वह दोषी नहीं है।” कृपया बाइबल को याद रखें। “वह जो रोटी के लिए चोरी करता है वह दोषी नहीं है।” इसी तरह, अगर हम असंदिग्ध आवश्यकता के कारण वीगन भोजन करते हैं, तो हमारे पास और कुछ और नहीं है। (जानवर-लोगो) मांस नहीं, तो फिर क्या खाओगे? आपको वीगन भोजन, सब्जियां खानी होंगी। तो यह सबसे कम; सबसे अपरिहार्य चीज है। तो इसमें खास अपराधबोध नहीं है। ईश्वर दयालु है।(मास्टर...) हाँ। (मैं इसे इस तरह समझता हूँ... आपने कहा कि नरक या स्वर्ग का अस्तित्व है। प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए स्वर्ग या नरक स्वयं बनाएगा, यह निर्भर करता है। सही। (तो इसका मतलब यह है कि इतने सारे नरकों या इतने सारे स्वर्गों, जिनमें कुत्ते और बिल्ली शामिल हैं, क्या वे अपना स्वयं का भी बना सकते हैं?) और मैं यह समझना चाहूंगा कि आप नरक या स्वर्ग की बात कर रहे हैं, क्या वह प्रत्येक व्यक्ति के मन में मौजूद नरक या स्वर्ग है, या फिर प्रत्येक व्यक्ति की मृत्यु के बाद ही उन्हें नरक या स्वर्ग दोनों में से कोई एक स्थिति का सामना करना पड़ता है। तो, इस बारे में सोचते हुए, मुझे उलझन होती है। पुनर्जन्म।कुछ मामलों में, जैसा कि बुद्ध ने कहा था, कभी-कभी इस जीवन के समाप्त होने के बाद, हम किसी दूसरे ग्रह पर पुनर्जन्म लेंगे, या हम इसी ग्रह पर पुनर्जन्म ले सकते हैं - किंतु अब और मनुष्य के रूप में नहीं, शायद कोइ कुत्ते, कोइ बिल्ली या कुछ और के रूप में। तो, इसका मतलब यह है कि ऐसी स्थिति में न तो नरक है और न ही स्वर्ग, बल्कि वे किसी दूसरे ग्रह पर पुनर्जन्म लेते हैं। तो चलिए कुछ... इससे मुझे यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि अन्य ग्रहों पर नरक या स्वर्ग की संरचना ही अलग-अलग है। शायद कुछ ग्रह में, इस ग्रह से भी अधिक सुखी हों, इसीलिए लोग इसे "स्वर्ग" कहते हैं। शायद। तो, मैं यह जानना चाहूंगा।) आपका कहना है कि बुद्ध ने नरक का उल्लेख नहीं किया? (अरे, ...इसके बारे में कहा तो था, लेकिन मैं अब भी उलझन में हूँ।) मुझे नहीं पता।) उन्होंने कहा था। (हम बात कर रहे हैं पुनर्जन्म के बारे में? पुनर्जन्म के बारे में क्या ख्याल है? पुनर्जन्म का अर्थ है एक शरीर से दूसरे शरीर में जाना। (जी हाँ।) पुनर्जन्म का नियम। आपकी मृत्यु के बाद, आप किसी अन्य प्रकार के जीवन में पुनर्जन्म ले सकते हैं। उन्हें कहा जाता है लुआन हो (पुनर्जन्म) औलासेस (वियतनामी) में। (जी हाँ।) अब, नरक जिसका जिक्र बुद्ध ने किया था। आप घर जाकर अर्थ स्टोर बोधिसत्व सूत्र पढ़ें। क्षितिगर्भ सूत्र। क्षितिगर्भ सूत्र में बुद्ध ने नरक के बारे में बात की थी - आपने क्यों मना किया? उन्होंने की थी। (जी हाँ। मैं वह समझता हूँ।)ठीक है। अब नरक आपके दिमाग में रचा जाता है, लेकिन वह आपके दिमाग के बाहर भी होता है। मैं ऐसा क्यों कहती हूं कि आपके मन में और बाहर? ऐसा इसलिए है क्योंकि सब कुछ हमारे अपने दिमाग द्वारा उतपन्न किया गया है, लेकिन हम इसे महसूस नहीं कर पाते हैं। और हम सोचते हैं कि यह हमारे से बाहर है, और इसी के कारण हमें कष्ट होता है। और हमें अब भी लगता है कि हम उस नरक या किसी भी ऐसी स्थिति से बहुत अधिक पीड़ित हैं जिसे हमने खुद बनाया है। लेकिन यही माया की चालाकी है। यही तो भ्रम का कमाल है। इसीलिए लोग कभी इनसे बाहर नहीं निकल पाते। अन्यथा, बुद्ध के आने की कोई आवश्यकता नहीं, (प्रभु) यीशु मसीह के आने की भी कोई आवश्यकता नहीं। क्योंकि यह इतनी भयानक और इतनी अकल्पनीय है, माया की चालें - एक महान जादूगरनी। वह इस तरह की चीजें बनाता है। यह माया है। यह कोई व्यक्ति नहीं है, यह प्रकृति की एक ऐसी शक्ति है जो लोगों को उलझाने, मोहित करने और इस दुनिया में फंसाने का काम करती है। लेकिन इस बीच, हमें इस भ्रम से बाहर निकलने के लिए संघर्ष अवश्य करना होगा।Photo Caption: "यह जानकर कि यहाँ जीवन क्षणभंगुर है, सदा रहने वाले जीवन को पाने की कोशिश करें!"











